
अध्याय 1: अधूरा सच
सुबह की पहली किरण जब मथुरा की तंग गलियों और पक्के घाटों को छूती थी, तो शहर एक अजीब सी सुस्ती से बाहर निकलता था। यमुना का शांत जल, दूर मंदिरों से गूंजती घंटियों की आवाज़, और सर्द हवाओं का झोंका—सब कुछ सामान्य लगता था। लेकिन इंस्पेक्टर मनीष के लिए यह सामान्यता अब एक छलावा बन चुकी थी।
पुलिस स्टेशन के अपने छोटे से केबिन में बैठे मनीष की आंखें लाल थीं। रात भर आंखों में एक पल भी नींद नहीं आई थी। टेबल पर चाय का कप रखा था, जो अब पूरी तरह ठंडा हो चुका था। उसके सामने खुली थी—‘Courtroom 302’ की वह फाइल, जिसे बंद हुए अभी कुछ ही दिन बीते थे।
विकास मल्होत्रा को उम्रकैद की सजा सुनाए जाने के बाद शहर में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया था। हर किसी को लगा था कि केस सुलझ गया है। राकेश मल्होत्रा की हत्या कातिल विकास ने की थी, गवाह रामू काका की हत्या का राज भी खुल चुका था, और अदालत ने अपना फैसला सुना दिया था। कागजों के हिसाब से केस फाइलों के बक्से में हमेशा के लिए बंद होने को तैयार था।
लेकिन मनीष का अंतःकरण कह रहा था कि यह अंत नहीं है। यह सिर्फ एक पर्दा है, जिसके पीछे असली नाटक अभी भी चल रहा है।
“सर…” दरवाजे पर हल्की सी दस्तक के साथ सब-इंस्पेक्टर अजय अंदर आया। उसके हाथ में कुछ नई फाइलें थीं। “सिटी थाने से कुछ पुराने रिकॉर्ड्स मंगवाए थे, जो S-17 प्रोजेक्ट से जुड़े हैं। जैसा आपने कहा था, हर एक पन्ने की दोबारा छंटनी कर रहे हैं।”
मनीष ने अपनी थकी हुई पलकें उठाईं और अजय को देखा। “सिर्फ छंटनी नहीं, अजय। हमें हर उस कड़ी को टटोलना है जो इस कहानी के बैकग्राउंड में छुपी हुई है। विकास ने जुर्म कुबूल कर लिया, अदालत ने सजा सुना दी, रामू काका का मुंह हमेशा के लिए बंद हो गया, और अमित वर्मा अचानक गायब होकर फिर प्रकट हो गया—तुम्हें नहीं लगता कि यह सब कुछ बहुत आसानी से हो गया?”
अजय ने फाइलें मेज पर रखते हुए कहा, “सर, कानून सबूत देखता है। और हमारे पास विकास के खिलाफ पुख्ता सबूत थे। कोर्ट ने भी मान लिया कि जमीन और संपत्ति के लालच में विकास ने अपने भाई राकेश को मारा।”
मनीष अपनी कुर्सी से उठा और खिड़की के पास जाकर खड़ा हो गया। बाहर पुलिस स्टेशन के प्रांगण में सुबह की धूप फैल रही थी। उसने गहरी सांस ली और कहा, “यही तो गच्चा है, अजय। विकास लालची था, इसमें कोई दो राय नहीं है। वह अपने भाई की संपत्ति हड़पना चाहता था, यह भी सच है। लेकिन क्या एक सीधा-साधा दिखने वाला इंसान, जो पुलिस के डर से कांपता था, इतनी सफाई से दो-दो हत्याएं कर सकता है? और सबसे बड़ी बात—वह कागज़… जिस पर लिखा था ‘Courtroom 302 में मिलते हैं’।”
मनीष ने मुड़कर अजय की तरफ देखा। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी। “विकास की लिखावट और उस कागज़ की लिखावट का मिलान आज तक मैच नहीं हुआ था। हमने उसे नजरअंदाज कर दिया क्योंकि हमें लगा कि वह सिर्फ एक धमकी है। लेकिन वह धमकी नहीं, एक स्क्रिप्ट थी।”
“स्क्रिप्ट?” अजय ने हैरान होकर पूछा।
“हाँ, स्क्रिप्ट!” मनीष की आवाज़ सख्त हो गई। “और उस स्क्रिप्ट का लेखक कोई और है। विकास सिर्फ उस नाटक का एक ऐसा किरदार था जिसे बलि का बकरा बनाया गया।”
अजय कुछ पल के लिए शांत रहा। उसने मनीष के चेहरे के भावों को पढ़ा और धीरे से पूछा, “तो आपका इशारा किसकी तरफ है? क्या आपको अभी भी अर्जुन मेहरा पर शक है?”
अर्जुन मेहरा का नाम आते ही कमरे का तापमान जैसे बदल गया। वही वकील, जिसने शांत मुस्कान के साथ कोर्ट में आकर पूरे केस का रुख मोड़ दिया था। वही इंसान जिसने अंत में यह खुलासा किया था कि S-17 प्रोजेक्ट की जमीन पर जो आग लगी थी, उसमें उसके पिता की मौत हुई थी और राकेश, अमित व विकास उसके गुनहगार थे।
मनीष ने अपनी मेज पर रखी उस छोटी सी चिट्ठी को उठाया, जो अर्जुन ने जाते-जाते उसे दी थी— “Game Never Ends.”
“शक की बात नहीं है, अजय,” मनीष ने गंभीर स्वर में कहा, “अर्जुन ने अदालत में जो कहा, वह आधा सच था। उसके पिता की मौत उस आग में हुई थी, यह सच है। लेकिन उसने अपने इस निजी बदले को कानून के शिकंजे में इस तरह पिरोया कि पुलिस और अदालत, दोनों उसके हाथों की कठपुतली बन गईं। उसने किसी को मारा नहीं, उसने बस सबको एक ऐसे रास्ते पर धकेल दिया जहाँ वे खुद-ब-खुद एक-दूसरे को तबाह कर लें।”
“लेकिन सर, अगर उसने ऐसा किया भी है, तो हमारे पास उसके खिलाफ कानूनी रूप से क्या है?” अजय ने व्यावहारिक सवाल उठाया। “कोर्ट ने फैसला सुना दिया है। अगर हम बिना किसी ठोस सबूत के अर्जुन मेहरा के खिलाफ दोबारा जांच शुरू करेंगे, तो उच्च अधिकारियों से लेकर मीडिया तक हम पर सवाल खड़े कर देंगे। लोग कहेंगे कि पुलिस अपनी नाकामी छुपाने के लिए एक सम्मानित वकील को परेशान कर रही है।”
मनीष कुछ देर तक खामोश रहा। उसने अपनी मेज पर रखी फाइलों को देखा। वह जानता था कि अजय गलत नहीं कह रहा था। कानून सबूत मांगता है, भावनाएं या अंतःप्रेरणा नहीं। लेकिन मनीष का जमीर उसे चैन से बैठने नहीं दे रहा था।
“कानून सबूत मांगता है, अजय। तो हम सबूत ढूंढेंगे,” मनीष ने दृढ़ता से कहा। “विकास से दोबारा मिलूंगा। जेल जाने के बाद से वह एक शब्द नहीं बोला है। उसे डर है। लेकिन जब किसी इंसान का डर उसकी उम्मीद से बड़ा हो जाता है, तो वह बोलना शुरू कर देता है।”
दोपहर ढलते-ढलते मनीष जिला कारागार (जिला जेल) के गेट पर था। मथुरा की इस पुरानी जेल की ऊंची दीवारें और लोहे के भारी दरवाजे हमेशा से एक अलग ही खौफ पैदा करते थे। मनीष अपनी खाकी वर्दी में जब अंदर दाखिल हुआ, तो जेल के अधिकारियों ने उसका स्वागत किया। कुछ ही देर में उसे उस विशेष जेल के पास ले जाया गया जहाँ विकास मल्होत्रा को रखा गया था।
जेल की सलाखों के पीछे विकास जमीन पर बैठा था। उसके बाल बिखरे हुए थे, आँखों के नीचे गहरे काले घेरे थे, और शरीर पर जेल की कैदी वाली पोशाक थी। कुछ दिन पहले तक जो इंसान महंगे सूट पहनकर कोर्ट के बाहर अकड़ता था, आज वह किसी लावारिस की तरह कोने में सिमटा हुआ था।
मनीष ने लोहे की सलाखों के पास आकर धीरे से कहा, “विकास।”
आवाज़ सुनकर विकास ने चौंककर सिर उठाया। जब उसने सामने इंस्पेक्टर मनीष को खड़ा देखा, तो उसके चेहरे की हवाइयाँ उड़ गईं। वह तेजी से पीछे हटा, जैसे किसी भूत को देख लिया हो।
“आप… आप यहाँ क्यों आए हैं?” विकास की आवाज़ कांप रही थी। “फैसला हो चुका है। मुझे उम्रकैद मिल चुकी है। अब और क्या चाहिए आपको?”
मनीष ने कोई गुस्सा नहीं दिखाया। वह बहुत शांत और संयमित स्वर में सलाखों के पास एक छोटी सी लोहे की बेंच पर बैठ गया।
“फैसला कागजों पर हुआ है, विकास, जमीर पर नहीं,” मनीष ने उसकी आँखों में झांकते हुए कहा। “तू जानता है और मैं भी जानता हूँ कि तूने अपने भाई राकेश का खून नहीं किया था।”
विकास का दिल जोरों से धड़कने लगा। उसने इधर-उधर देखा, जैसे कोई उसकी बात सुन रहा हो। उसके होंठ थरथराए, “नहीं… मैंने सब कबूल किया है। जज साहब के सामने मैंने कहा था कि मैंने मारा है।”
“क्यूंकि तुझे सिखाया गया था कि यही तेरे बचने का इकलौता रास्ता है,” मनीष ने बात काटते हुए कहा। “तुझे कहा गया था कि अगर तू जुर्म कबूल कर लेगा, तो तुझे कम सजा मिलेगी या किसी गुप्त रास्ते से निकाल लिया जाएगा। लेकिन तुझे बेवकूफ बनाया गया, विकास। अर्जुन मेहरा ने तुझे मोहरा बनाया। उसने अपने पिता की मौत का बदला लेने के लिए तेरी और तेरे भाई की दुश्मनी का इस्तेमाल किया।”
विकास के चेहरे का रंग फीका पड़ गया। उसने अपना सिर दोनों हाथों में थाम लिया और धीमी सुबकियों के साथ बोला, “आप कुछ नहीं जानते… वह बहुत खतरनाक आदमी है। अगर मैं कुछ बोलूंगा, तो मैं जिंदा नहीं बचूँगा। जेल के अंदर भी उसकी पहुँच है।”
मनीष तुरंत अपनी जगह से उठा और सलाखों के बिलकुल करीब आ गया। उसने विकास के कंधे को कसकर पकड़ लिया।
“मुझसे डरने की जरूरत नहीं है, विकास। जेल के अंदर तू सुरक्षित है, बशर्ते तू मुझे सच बता दे। उस रात वाकई क्या हुआ था? जब तू राकेश के कमरे में गया था, तो वहाँ कौन था?”
विकास की आँखें आंसुओं से भर गईं। उसका शरीर कांप रहा था। उसने फंसी हुई आवाज़ में कहा, “उस रात… जब मैं अपने कमरे से निकला था क्योंकि मुझे राकेश से पैसों के विवाद पर बात करनी थी… तब… तब जब मैं उसके कमरे के पास पहुँचा, तो दरवाजा खुला हुआ था।”
“फिर?” मनीष की सांसें तेज हो गईं।
“मैंने अंदर झांका… राकेश जमीन पर खून से लथपथ पड़ा था। उसकी साँसों की डोर टूट चुकी थी। मैं डर गया… मैं चीखना चाहता था, लेकिन तभी… तभी पीछे से किसी ने मेरा मुंह भींच दिया।” विकास की आवाज़ और धीमी हो गई, मानो वह उस भयानक रात को दोबारा जी रहा हो।
“किसने?” मनीष ने लगभग डांटते हुए पूछा।
“मुझे चेहरा साफ नहीं दिखा… कमरे में अंधेरा था… सिर्फ खिड़की से आती हल्की रोशनी थी। उस आदमी ने मेरे हाथ पकड़कर उस खून से सने चाकू पर जबरदस्ती रखवा दिए। उसने मेरे कान में कहा था—‘अगर जिंदा रहना चाहता है, तो चुपचाप पुलिस के सामने वही बोलियो जो मैं कहूँ। वरना अगला नंबर तेरा होगा।’”
मनीष का माथा ठनक गया। “और वह आदमी कौन था? क्या वह अर्जुन मेहरा था?”
विकास ने सिर हिलाया, “चेहरा तो मैंने नहीं देखा… लेकिन… लेकिन उसकी कलाई पर एक खास तरह का कड़ा बंधा हुआ था। एक भारी चांदी का कड़ा, जिस पर कुछ डिजाइन बनी थी।”
मनीष के दिमाग में बिजली कौंध गई। चांदी का कड़ा… भारी डिजाइन… यह हुलिया उसके दिमाग में किसी और की तरफ इशारा कर रहा था या खुद अर्जुन की तरफ?
“क्या वह अर्जुन था?” मनीष ने जोर देकर पूछा।
“नहीं… वह अर्जुन नहीं था,” विकास ने रोते हुए कहा। “अर्जुन मेहरा तो बाद में आया था… जब पुलिस आ चुकी थी। वह आदमी कोई और था… कोई ऐसा, जो बहुत लंबा और ताकतवर था… जिसकी परछाईं मैंने बाद में उस सीसीटीवी फुटेज में भी देखी थी!”
यह एक बहुत बड़ा सुराग था। मनीष को समझ आ गया कि केस में एक और किरदार ऐसा था जिसे अभी तक किसी ने नहीं देखा था—एक ‘दूसरा आदमी’, जो पर्दे के पीछे रहकर इस पूरे खेल को चला रहा था।
जेल से बाहर निकलते ही मनीष ने सीधे अपने दफ्तर का रुख नहीं किया। उसने अपनी गाड़ी का रुख शहर के उस पुराने पॉश इलाके की तरफ मोड़ा, जहाँ अर्जुन मेहरा का ऑफिस और आवास था।
धुंधलका गहराने लगा था। सर्दियों की शाम में मथुरा की सड़कों पर कोहरा छाने लगा था। मनीष की जिप्सी जब अर्जुन मेहरा के आलीशान बंगले के बाहर रुकी, तो वहाँ का सन्नाटा कुछ अजीब सा लग रहा था। बंगले के बाहर कोई गार्ड नजर नहीं आ रहा था, और मुख्य गेट पर एक ताला लटका हुआ था।
मनीष ने गाड़ी से उतरकर गेट के पास जाकर देखा। ताले पर धूल जमी थी, जिससे साफ पता चलता था कि यह पिछले दो-तीन दिनों से बंद है।
“अरे साहब, इन्हें ढूंढ रहे हो क्या?” पास ही पान की एक दुकान चलाने वाले बूढ़े ने अपनी दुकान से बाहर झांकते हुए कहा।
मनीष तेजी से उस बूढ़े के पास गया और अपना आईकार्ड दिखाते हुए पूछा, “बाबा, यहाँ जो वकील साहब रहते थे—अर्जुन मेहरा—वे कहाँ गए? पिछले दो दिनों से ताला क्यों लगा है?”
बूढ़े ने पान थूकते हुए कहा, “साहब, वे तो कल सुबह ही अपनी बड़ी सी गाड़ी में सारा सामान समेटकर कहीं बाहर चले गए। जाते वक्त कह रहे थे कि अब वे इस शहर में कभी वापस नहीं आएंगे। उन्होंने तो अपने दफ्तर के स्टाफ को भी एडवांस सैलरी देकर छुट्टी दे दी थी।”
मनीष का दिल एक पल के लिए बैठ गया।
वह भागकर अर्जुन के बंगले की दीवार के पास गया और फलांग कर अंदर कूद गया। बगीचे में सन्नाटा था। उसने बंगले के मुख्य दरवाजे के पास जाकर देखा—दरवाजा अंदर से बंद था, लेकिन एक खिड़की का शीशा हल्का सा चटका हुआ था।
मनीष ने अपनी जेब से एक छोटी सी लोहे की रॉड निकाली और सावधानी से खिड़की का कुंडा खोलकर अंदर दाखिल हुआ।
अंदर का नजारा चौंकाने वाला था।
आलीशान ड्राइंग रूम पूरी तरह खाली था। दीवारें सूखी थीं जहाँ से तस्वीरें उतार ली गई थीं। फर्नीचर पर चादरें पड़ी थीं। ऐसा लग रहा था कि यह घर महीनों से नहीं, बल्कि सालों से खाली हो। लेकिन एक बात अजीब थी—हवा में कॉफी की हल्की सी खुशबू आ रही थी, और सेंटर टेबल पर एक कप में अभी भी आधी कॉफी भरी हुई थी, जो हल्की गर्म थी।
मतलब, यहाँ कोई कुछ मिनट पहले ही मौजूद था।
मनीष ने अपनी सर्विस रिवॉल्वर निकाली और सतर्क कदमों से आगे बढ़ने लगा। घर के हर कमरे की तलाशी लेते हुए वह जब अर्जुन के स्टडी रूम में पहुँचा, तो वहाँ की दीवार पर टंगी एक बड़ी सी पेंटिंग के पास उसकी नजर रुक गई।
वह पेंटिंग S-17 प्रोजेक्ट की किसी पुरानी जमीन की थी।
मनीष ने उस पेंटिंग को थोड़ा सा हटाया, तो पीछे दीवार में एक छोटा सा तिजोरी नुमा बॉक्स बना हुआ था, जो खुला हुआ था। उसके अंदर एक पेन ड्राइव और एक लिफाफा रखा था।
मनीष ने दस्ताने पहने, पेन ड्राइव और लिफाफे को उठाया। लिफाफे पर उसके ही नाम से कुछ लिखा था— “For Inspector Manish Chaudhary.”
उसने दिल की धड़कनों को थामते हुए लिफाफा खोला और उसके अंदर का पत्र पढ़ा। लाल स्याही से बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था:
“प्रिय इंस्पेक्टर मनीष,अगर आप यह पत्र पढ़ रहे हैं, तो इसका मतलब है कि आपकी जिद ने आपको यहाँ तक खींच ही लिया। आप एक अच्छे पुलिसवाले हैं, मनीष बाबू। आप सच की तलाश करना चाहते हैं, लेकिन आप यह भूल जाते हैं कि हर सच के कई पहलू होते हैं।
विकास मोहरा था, राकेश पापी था, और रामू काका अपनी किस्मत के मारे थे। लेकिन इस खेल का अंत अभी नहीं हुआ है। S-17 प्रोजेक्ट की असली फाइल अब डिजिटल रूप में इस पेन ड्राइव में है। उस आग में सिर्फ तीन लोग नहीं मरे थे, बल्कि चार लोग थे। चौथे इंसान का नाम क्या था? यह आपको इस पेन ड्राइव में मिल जाएगा।
खेल अभी बाकी है, इंस्पेक्टर। मिलते हैं किसी नए मोड़ पर…
पत्र पढ़ते ही मनीष की रीढ़ में एक सिहरन दौड़ गई।
चौथा इंसान?
S-17 प्रोजेक्ट की आग में तीन लोगों के मरने की बात सामने आई थी—जैसा कि रिकॉर्ड्स में दर्ज था। लेकिन अगर चौथा इंसान भी था, तो वह कौन था? और क्या वह जिंदा है या उसी आग में उसकी भी बलि दी गई थी?
मनीष ने तेजी से पेन ड्राइव अपनी जेब में रखी और बंगले से बाहर निकल आया। उसके माथै पर पसीना आ गया था, भले ही ठंड का मौसम था। उसे समझ आ गया था कि अर्जुन मेhra भागा नहीं है, बल्कि उसने जानबूझकर मनीष के लिए यह सुराग छोड़ा है। वह चाहता था कि मनीष इस गहराई तक उतरे।
रात के दस बज चुके थे। पुलिस स्टेशन का माहौल शांत था। मनीष अपने केबिन में अकेला बैठा था। उसने अपना पर्सनल लैपटॉप निकाला और उस पेन ड्राइव को उसमें प्लग इन किया।
ड्राइव में सिर्फ एक ही वीडियो फाइल थी। फाइल का नाम था— “The Truth of S-17.”
मनीष ने गहरी सांस ली और वीडियो प्ले कर दिया।
स्क्रीन पर अंधेरा था। कुछ सेकंड बाद एक पुराना, घबराया हुआ वीडियो चलना शुरू हुआ। यह किसी हैंडिकॉम कैमरे से शूट किया गया था। वीडियो में एक पुरानी फैक्ट्री का परिसर दिख रहा था—वही S-17 प्रोजेक्ट वाली जमीन। रात का वक्त था। चारों तरफ मशीनें थीं।
वीडियो में तीन लोग आपस में बहस कर रहे थे। एक तरफ राकेश मल्होत्रा था, दूसरी तरफ अमित वर्मा था, और तीसरा इंसान कौन था, उसका चेहरा साफ नहीं दिख रहा था क्योंकि उसने जैकेट का हुड पहना हुआ था।
वे तीनों किसी बात को लेकर आपस में झगड़ रहे थे।
तभी वीडियो में एक चौथी आवाज़ गूंजी—एक युवा लड़के की रोती हुई आवाज़।
“पापा! इन्हें मत छोड़िए! इन्होंने सब कुछ छीन लिया है हमारा!”
स्क्रीन पर एक चौदह-पंद्रह साल का लड़का दिखाई दिया, जिसके हाथ बंधे हुए थे और उसे एक खंभे से बांधा गया था। वह लड़का कोई और नहीं, बल्कि खुद अर्जुन मेहरा था—अपने बचपन के दिनों में!
मनीष की आँखें फटी की फटी रह गईं।
वीडियो में आगे दिखा कि राकेश मल्होत्रा ने गुस्से में आकर कहा, “अगर यह लड़का और इसका बाप जिंदा रहे, तो यह प्रोजेक्ट हमारे हाथ से निकल जाएगा। आग लगा दो इस गोदाम में! किसी को पता नहीं चलना चाहिए कि यहाँ कोई था।”
और इसके बाद… स्क्रीन पर चीख-पुकार मच गई। आग की लपटें उठने लगीं। कैमरे का एंगल हिल गया और जमीन पर गिर गया। वीडियो में दिख रहा था कि कैसे अर्जुन के पिता ने अपनी जान पर खेलकर उस छोटे से अर्जुन को एक खिड़की से बाहर धकेल दिया था, और खुद उस आग की भट्टी में समा गए थे।
वीडियो यहीं खत्म हो गया।
मनीष का खून खौल उठा। उसके हाथ कांपने लगे।
वह अब समझ चुका था कि अर्जुन मेहरा के दिल में यह नफरत क्यों थी। वह कोई आम क्रिमिनल या शातिर वकील नहीं था, बल्कि वह उस बच्चे का बड़ा हुआ रूप था, जिसके सामने उसके पिता को जिंदा जला दिया गया था। उसने कानूनी सिस्टम को हथियारों की तरह इस्तेमाल करके उन सभी लोगों को तबाह कर दिया जिन्होंने उसके परिवार को उजाड़ा था।
लेकिन… एक सवाल अभी भी बाकी था।
अगर अर्जुन ने यह सब बदला लेने के लिए किया, तो क्या इस खेल में कोई और भी शामिल था? वह ‘दूसरा आदमी’ कौन था जिसकी कलाई पर चांदी का कड़ा बंधा हुआ था और जिसका जिक्र विकास ने किया था?
तभी मनीष के फोन की घंटी बजी।
स्क्रीन पर अज्ञात नंबर फ्लैश हो रहा था।
मनीष ने तुरंत फोन उठाया और सख्त आवाज़ में कहा, “कौन है?”
फोन के दूसरी तरफ से एक ठंडी भरी हँसी गूंजी। वह आवाज़ अर्जुन मेहरा की नहीं थी। वह कोई और था।
“इंस्पेक्टर मनीष… वीडियो कैसा लगा? सच डरावना होता है ना?” उस शख्स ने कहा।
“तू कौन है? सामने आ!” मनीष चिल्लाया।
“मैं वहीं हूँ, इंस्पेक्टर साहब… जहाँ से इस खेल की शुरुआत हुई थी। अगर अपने उस छोटे से थाने से जिंदा बाहर निकलना चाहते हो, और सच का पूरा पर्दाफाश देखना चाहते हो, तो कल सुबह ठीक पाँच बजे… उसी पुरानी S-17 फैक्ट्री के खंडहर में अकेले आ जाना। वरना… अगला नंबर तुम्हारा होगा।”
फोन कट गया।
पूँ-पूँ की आवाज़ के साथ लाइन Dead हो गई।
मनीष ने फोन को मेज पर पटका। उसकी आँखों में डर नहीं, बल्कि एक अजीब सी जिद्द थी। उसने अपनी सर्विस रिवॉल्वर निकाली, उसकी मैगजीन चेक की, उसे लोड किया और अपनी कमर में खोंस लिया।
“खेल खत्म नहीं हुआ है…” मनीष ने खुद से कहा, और अपने केबिन की लाइट बुझाकर बाहर निकल गया।
बाहर मथुरा की ठंडी रात में कोहरा और घना हो चुका था, और उस कोहरे के पार एक ऐसा सच इंतजार कर रहा था जो सब कुछ बदल देने वाला था।
